अनुराग कश्यप ने पिछले साल अपने एक इंटरव्यू में एक फिल्म मेकर के नाम का जिक्र किया था। उन्होंने अपनी फिल्मों के बारे में बात करते हुए बताया था कि उन्हें ईरान और चीन के फिल्म निर्मातओं से प्रेरणा मिलती है और कई कोरियाई लोग भी उनके लिए प्रेरणा है, जो उम्र के साथ-साथ खुद को बेहतर बनाते चले जाते हैं। इसी दौरान उन्होंने इंडियन पैरेलल सिनेमा आंदोलन के सबसे चर्चित डायरेक्टर अवतार कृष्ण कौल के नाम का भी जिक्र किया था। आज हम आपको इन्हीं अवतार कृष्ण कौल के बारे में बताते हैं। एक ऐसे फिल्म डायरेक्टर, जिन्होंने अपने पूरे करियर में सिर्फ 1 ही फिल्म का निर्देशन किया और इसके लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड भी मिला। लेकिन, बदकिस्मती कि जिस दिन उन्हें नेशनल अवॉर्ड मिला, उसी दिन उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
अवतार कृष्ण कौल कौ जन्म 1939 में श्रीनगर में हुआ था। उनके पिता काफी सख्त मिजाज के थे और एक दिन गुस्से में उन्होंने अवतार को घर से निकाल दिया। घर से निकाले जाने के बाद अपने गुजारे के लिए अवतार कृष्ण कौल ने एक चाय की दुकान पर काम करना शुरू कर दिया और अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। कुछ सालों बाद उन्हें विदेश मंत्रालय में सरकारी नौकरी मिल गई और न्यूयॉर्क में नियुक्ति हुई। यहीं उन्होंने फिल्म मेकिंग का काम सीखा।
अवतार कृष्ण कौल के भतीजे विनोद कौल ने एक इंटरव्यू में बात करते हुए कहा था- 'वह (अवतार कृष्ण कौल) एसोसिएटेड प्रेस के लिए बतौर कॉपी होल्डर काम करते थे। एक दिन संपादक ने उन्हें ऑर्थर कोस्टली की किताब 'डार्कनेस एट नून' पढ़ते देखा और उन्हें एहसास हुआ कि अवतार पढ़े-लिखे हैं। इसके बाद उन्होंने उन्हें एक समाचार में लेखक की नौकरी दे दी। 1964 तक उन्होंने ये नौकरी की और फिर ब्रिटिश सूचना सेवा में शामिल हो गए।'
1970 में अवतार कृष्ण कौल मर्चेंट/आइवरी प्रोडक्शंसन की फिल्म 'बॉम्बे टॉकी' में काम करने के लिए मुंबई आई, जिसमें शशि कपूर, इस्माइल मर्चेंट और अपर्णा सेन जैसे कलाकार थे। इसके बाद उन्होंने अपनी फिल्म का निर्देशन किया। उन्होंने राखी और एमके रैना स्टारर '27 डाउन' बनाई, जो रमेश बख्शी के हिंदी उपन्यास 'अठारा सूरज के पौधे' पर आधारित थी। फिल्म एक रेलवे कर्मचारी के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी ट्रेन में एक लड़की से मुलाकात होती है। इस फिल्म के लिए उन्होंने नेशनल अवॉर्ड भी जीता।
अवतार के भतीजे विनोद कौल ने अपने लेख में खुलासा किया था कि भले ही अवतार को उनके पिता ने घर से निकाल दिया था, लेकिन उनके लिए उनका परिवार हमेशा सबसे आगे रहा। बुरे व्यवहार और कठिनाइयों के बाद भी उन्होंने परिवार के हर सदस्य का ध्यान रखा और अंतिम सांस तक परिवार का सहारा बनकर रहे। लेकिन, अचानक एक दिन उनके निधन की सूचना मिली, जिससे पूरा परिवार हैरान रह गया। उनकी मौत डूबने से हुई थी और उनकी मौत से कुछ घंटे पहले ही उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता घोषित किया गया था।
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